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शरद पवार, ममता बनर्जी और केसीआर का उत्तराधिकारी कौन? क्षेत्रीय दलों में नेतृत्व परिवर्तन की कवायद

नई दिल्ली : पिछले दिनों महाराष्ट्र की राजनीति में खांसी हलचल तब दिखाई दी, जब एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने अपनी पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। उनके अचानक सामने आए इस्तीफे ने सिर्फ एनसीपी में ही नहीं, महा विकास आघाडी में भी खलबली मचा दी। हालांकि तीन दिन तक चले सियासी ड्रामे के बाद शरद पवार ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया, लेकिन माना जा रहा है कि यह सारी कवायद पार्टी में उनके भतीजे और उत्तराधिकारी माने जा रहे अजित पवार के संभावित विद्रोह के मद्देनजर थी, जिसमें कुछ विधायकों के टूट की संभावना जताई जा रही थी। माना जा रहा है कि पवार के इस कदम ने न सिर्फ पार्टी को एकजुट कर दिया, बल्कि उनके नेतृत्व को फिर से पुख्ता कर दिया। लेकिन उम्र के आठ दशक पार कर चुके शरद पवार को पता है कि भले इस बार उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल से मौजूदा संकट को टाला लेकिन उन्हें जल्द ही शरद पवार के बाद कौन हैं, सवाल का जवाब तलाशना होगा।

युवा चेहरों ने संभाली कमान

पिछले एक दशक में कई क्षेत्रीय दलों में नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया देखी गई। इनमें से दो अहम चेहरे हैं, बिहार के आरजेडी नेता तेजस्वी यादव और यूपी में एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव। जहां अखिलेश यादव ने परिवार में उत्तराधिकार की लड़ाई के बाद पार्टी की कमान संभाली तो वहीं तेजस्वी भले ही औपचारिक तौर पर पार्टी के अध्यक्ष ना हों, लेकिन आरजेडी संस्थापक और पिता लालू यादव के जेल जाने के बाद से पार्टी की कमान वही संभाल रहे हैं। बिहार के एक अन्य क्षेत्रीय दल एलजेपी की कमान भी पार्टी संस्थापक रामविलास पासवान के बाद उनके बेटे और सांसद चिराग पासवान संभाल रहे हैं। इस कड़ी में कर्नाटक के क्षेत्रीय दल जेडीएस का जिक्र भी आता है। पूर्व पीएम एच. डी. देवगौड़ा ने जनता दल से अलग होकर अपनी क्षेत्रीय पार्टी बनाई थी। हालांकि पार्टी के औपचारिक अध्यक्ष आज भी भले ही देवगौड़ा हों, लेकिन पार्टी की असली कमान उनके बेटे और पूर्व सीएम एचडी कुमारस्वामी के हाथों ही है।

परिवारवाद के चलते बदला नेतृत्व

परिवारवाद के आधार पर राजनैतिक दलों में नेतृत्व बदलाव की यह प्रक्रिया देश में ऊपर से नीचे तक दिखाई देती है। जम्मू कश्मीर में जहां जम्मू कश्मीर नैशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला हैं, तो वहीं उनके उत्तराधिकार की तस्वीर पूरी तरह से साफ है। उनके बाद पार्टी की कमान बेटे उमर अब्दुल्ला के हाथों में जाना तय है। वहीं प्रदेश के दूसरे क्षेत्रीय दल पीडीपी की कमान प्रदेश की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती संभाल रही हैं। उन्होंने अपने पिता और पार्टी के संस्थापक मुफ्ती मोहम्मद सईद के जाने के बाद पार्टी का नेतृत्व संभाला। ऐसा ही उदाहरण झारखंड से भी सामने आया, जहां पिता और पार्टी संस्थापक शिबू सोरेन की सेहत ठीक ना होने के चलते पार्टी की जिम्मेदारी बेटे और राज्य के सीएम हेमंत सोरेन ने संभाली।


इसी कड़ी में अगला नाम है तमिलनाडु के सीएम और डीएमके लीडर एमके स्टालिन का। स्टालिन ने अपने पिता एम. करुणानिधि की बढ़ती उम्र और ढीली सेहत के बाद अपने भाइयों की दावेदारी को नकारते हुए न सिर्फ पार्टी की कमान संभाली, बल्कि पार्टी को फिर से खड़ा करते हुए उसे सत्ता तक पहुंचाया। हालांकि तमिलनाडु में प्रमुख विपक्षी दल एआईडीएमके में नेतृत्व को लेकर तस्वीर अभी पूरी तरह से साफ नहीं है। वहां पूर्व सीएम जयललिता के निधन के बाद पार्टी पर पकड़ को लेकर दो पूर्व मुख्यमंत्रियों ओ पनीरसेल्वम और ई के पलानीस्वामी के बीच खींचतान है।

इन दलों पर रहेगी नजर

आने वाले कुछ सालों में जिन दलों में बदलाव होना है, उनमें तेलंगाना में बीआरएस, वेस्ट बंगाल में टीएमसी का नाम सहज ही सामने आता है। तेलंगाना केसीएम और टीआरएस के संस्थापक के चंद्रशेखर राव भले ही आज बीआरएस का असली चेहरा हों, उनके उत्तराधिकार की लड़ाई में बेटे के. टी. रामाराव और बेटी के कविता दिखाई देते हों, लेकिन मजबूत दावेदारी बेटे केटीआर की ही मानी जाती है, जो पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं। वहीं बंगाल में ममता बनर्जी के बाद उनके उत्तराधिकारी पार्टी के महासचिव और सीएम बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी माने जा रहे हैं। जबकि ओडिशा में सत्तारूढ़ बीजेडी सीएम नवीन पटनायक के बाद पार्टी नेतृत्व को लेकर तस्वीर पूरी तरह से धुंधली है। कुछ ऐसा ही हाल बीएसपी का दिखाई देता है, जहां मायावती के उत्तराधिकारी का चेहरा अपने आप में बड़ा सवाल है।

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